कालविसेसेणवहिदखेत्तविसेसो धुवा हवे वड्ढी।
अद्धुववड्ढी वि पुणो, अविरुद्धं इट्ठकंडम्मि॥408॥
अन्वयार्थ : किसी विवक्षित काण्डक के क्षेत्र विशेष में काल विशेष का भाग देने से जो शेष रहे उतना ध्रुव वृद्धि का प्रमाण है। इस ही तरह अविरोधरूप से इष्ट काण्डक में अध्रुव वृद्धि का भी प्रमाण समझना चाहिये॥408॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका