अंगुलअसंखभागं, संखं वा अंगुलं च तस्सेव।
संखमसंखं एवं, सेढीपदरस्स अद्धुवगे॥409॥
अन्वयार्थ : घनांगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण, वा घनांगुल के संख्यातवें भागप्रमाण वा घनांगुलमात्र,वा संख्यात घनांगुलमात्र, वा असंख्यात घनांगुलमात्र इसी प्रकार श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण, वा श्रेणी के संख्यातवें भागप्रमाण, वा श्रेणीप्रमाण, वा संख्यात श्रेणीप्रमाण, वा असंख्यात श्रेणीप्रमाण, वा प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण, वा प्रतर के संख्यातवें भाग प्रमाण, वा प्रतरप्रमाण, वा संख्यात प्रतरप्रमाण, वा असंख्यात प्रतरप्रमाण प्रदेशों की वृद्धि होने पर एक-एक समय की वृद्धि होती है। यही अध्रुव वृद्धि का क्रम है ॥409॥कम्मइयवग्गणं धुवहारेणिगिवारभाजिदे दव्वं।

  जीवतत्त्वप्रदीपिका