देसावहिवरदव्वं, धुवहारेणवहिदे हवे णियमा।
परमावहिस्स अवरं, दव्वपमाणं तु जिणदिट्ठं॥413॥
अन्वयार्थ : देशावधि का जो उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाण है उसमें एकबार ध्रुवहार का भाग देने से जो लब्ध आवे उतना ही नियम से परमावधि के जघन्य द्रव्य का प्रमाण निकलता है, ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है ॥413॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका