जीवतत्त्वप्रदीपिका
परमावहिस्स भेदा, सगउग्गाहणवियप्पहदतेऊ।
चरमे हारपमाणं, जेट्ठस्स य होदि दव्वं तु॥414॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका