
जं सामण्णं गहणं, भावाणं णेव कट्टुमायारं।
अविसेसदूण अट्ठे, दंसणमिदि भण्णदे समये॥482॥
अन्वयार्थ : भाव अर्थात् सामान्य-विशेषात्मक पदार्थों के आकार अर्थात् भेदग्रहण न करके जो सामान्य ग्रहण अर्थात् स्वरूपमात्र का अवभासन है, उसे परमागम में दर्शन कहते हैं। वस्तुस्वरूप मात्र का ग्रहण कैसे करता है ? अर्थात् पदार्थों के जाति, क्रिया, गुण आदि विकारों का विकल्प न करते हुए अपना और अन्य का केवल सत्तामात्र का अवभासन दर्शन है ॥482॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका