भावाणं सामण्ण-विसेसयाणं सरूवमेत्तं जं।
वण्णणहीणग्गहणं, जीवेण य दंसणं होदि॥483॥
अन्वयार्थ : सामान्य-विशेषात्मक पदार्थों का विकल्परहित स्वरूपमात्र जैसा है, वैसा जीव के साथ स्वपरसत्ता का अवभासन दर्शन है। जो देखता है, जिसके द्वारा देखा जाता है या देखनामात्र दर्शन है ॥483॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका