के विषय का प्रकाशन उसे गणधरादिक चक्षुदर्शन कहते हैं। पुनश्च, नेत्र बिना चार इन्द्रिय और मन के विषय का जो प्रकाशन, वह अचक्षुदर्शन है ऐसा जानना ॥484॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका