
बहुविहबहुप्पयारा, उज्जोवा परिमियम्मि खेत्तम्मि।
लोगालोगवितिमिरो, जो केवलदंसणुज्जोओ॥486॥
अन्वयार्थ : चन्द्रमा, सूर्य, रत्नादिक संबंधी बहुत भेदों से युक्त बहुत प्रकार के उद्योत जगत् में हैं। वे परिमित यानी मर्यादासहित क्षेत्र में ही अपना प्रकाश करने को समर्थ हैं। इसलिये उन प्रकाशों की उपमा देने योग्य नहीं ऐसा समस्त लोक और अलोक में अन्धकाररहित केवल प्रकाशरूप केवलदर्शन नामक उद्योत जानना ॥486॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका