जोगे चउरक्खाणं, पंचक्खाणं च खीणचरिमाणं।
चक्खूणमोहिकेवलपरिमाणं, ताण णाणं च॥487॥
अन्वयार्थ : मिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषाय गुणस्थानपर्यन्त जितने पंचेन्द्रिय हैं उनका तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की संख्या का परस्पर जोड़ देने से जो राशि उत्पन्न हो उतने ही चक्षुदर्शनी जीव हैं और अवधिज्ञानी तथा केवलज्ञानी जीवों का जितना प्रमाण है उतना ही क्रम से अवधिदर्शनी तथा केवलदर्शनवालों का प्रमाण हैं ॥487॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका