केवलणाणाणंतिमभागा भावादु किण्हतियजीवा।
तेउतियासंखेज्जा, संखासंखेज्जभागकमा॥539॥
अन्वयार्थ : भाव की अपेक्षा तीन अशुभ लेश्यावाले जीव, केवलज्ञान के जितने अविभागप्रतिच्छेद हैं उसके अनंतवें भागप्रमाण हैं। यहाँ पर भी पूर्ववत् उत्तरोत्तर हीनक्रम समझना चाहिये। पीत आदि तीन शुभ लेश्यावालों का द्रव्य की अपेक्षा प्रमाण सामान्य से असंख्यात है। तथापि पीतलेश्यावालों से संख्यातवें भाग पद्मलेश्यावाले हैं और पद्मलेश्यावालों से असंख्यातवें भाग शुक्ललेश्यावाले जीव हैं ॥539॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका