वेसदछप्पण्णंगुलकदिहिदपदरं तु जोइसियमाणं।
तस्स य संखेज्जदिमं, तिरिक्खसण्णीण परिमाणं॥541॥
अन्वयार्थ : दो सौ छप्पन अंगुल के वर्ग अर्थात् पण्णट्ठीप्रमाण (65536) प्रतरांगुल का भाग जगतप्रतर में देने से जो प्रमाण हो उतने ज्योतिषी देव हैं और इसके संख्यातवें भागप्रमाण संज्ञी तिर्यंच जीव हैं ॥541॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका