
सट्ठाणसमुग्घादे, उववादे सव्वलोयमसुहाणं।
लोयस्सासंखेज्जदिभागं खेत्तं तु तेउतिये॥543॥
अन्वयार्थ : विवक्षित लेश्यावाले जीव विवक्षित पद में रहते हुए वर्तमान में जितने आकाश में पाए जाते है, उसको क्षेत्र कहते हैं। यह क्षेत्र तीन अशुभ लेश्याओं का सामान्य से स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद की अपेक्षा सर्वलोकप्रमाण है और तीन शुभलेश्याओं का क्षेत्र लोक के असंख्यातवें भागमात्र है ॥543॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका