
सुक्कस्स समुग्घादे, असंखलोगा य सव्वलोगो य।
फासं सव्वं लोयं, तिट्ठाणे असुहलेस्साणं॥545॥
अन्वयार्थ : शुक्ल लेश्या का क्षेत्र लोक के असंख्यात भागों में से एकभाग को छोड़कर शेष बहुभागप्रमाण बताया है, सो केवली समुद्घात की अपेक्षा है। कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले जीवों का स्पर्श स्वस्थान, समुद्घात, उपपाद इन तीन स्थानों में सामान्य से सर्वलोक है ॥545॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका