तेउस्स य सट्ठाणे, लोगस्स असंखभागमेत्तं तु।
अडचोद्दसभागा वा, देसूणा होंति णियमेण॥546॥
अन्वयार्थ : पीतलेश्या का स्वस्थानस्वस्थान की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्श है और विहारवत्स्वस्थान की अपेक्षा त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है ॥546॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका