
एवं तु समुग्घादे, णव चोद्दसभागयं च किंचूणं।
उववादे पढमपदं, दिवह्नचोद्दस य किंचूणं॥547॥
अन्वयार्थ : विहारवत्स्वस्थान की तरह समुद्घात में भी त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है तथा मारणांतिक समुद्घात की अपेक्षा चौदह भागों में से कुछ कम नव भागप्रमाण स्पर्श है। और उपपाद स्थान में चौदह भागों में से कुछ कम डेढ़ भागप्रमाण स्पर्श है। इसप्रकार यह पीतलेश्या का स्पर्श सामान्य से तीन स्थानों में बताया है ॥547॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका