पम्मस्स य सट्ठाणसमुग्घाददुगेसु होदि पढमपदं।
अड चोद्दस भागा वा, देसूणा होंति णियमेण॥548॥
अन्वयार्थ : पद्मलेश्या का विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय तथा वैक्रियिक समुद्घात में चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है। मारणांतिक समुद्घात में चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण ही स्पर्श है, क्योंकि पद्मलेश्यावाले देव पृथ्वी, जल और वनस्पति में उत्पन्न नहीं होते हैं। तैजस तथा आहारक समुद्घात में संख्यात घनांगुल प्रमाण स्पर्श है। यहाँ पर मचङ्क शब्द का ग्रहण किया है, इसलिये स्वस्थानस्वस्थान में लोक के असंख्यात भागों में से एक भागप्रमाण स्पर्श है ॥548॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका