
उववादे पढमपदं पणचोदसभागयं च देसूणं।
सुक्कस्स य तिट्ठाणे, पढमो छच्चोदसा हीणा॥549॥
अन्वयार्थ : पद्मलेश्या शतार-सहस्रार स्वर्गपर्यन्त संभव है और शतार-सहस्रार स्वर्ग मध्यलोक से पाँच राजू ऊपर है, इसलिये उपपाद की अपेक्षा से पद्मलेश्या का स्पर्श त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम पाँच भागप्रमाण है। शुक्ललेश्यावाले जीवों का स्वस्थानस्वस्थान में तेजोलेश्या की तरह लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्श है और विहारवत्स्वस्थान तथा वेदना कषाय, वैक्रियिक मारणांतिक समुद्घात और उपपाद इन तीन स्थानों में चौदह भागों में से कुछ कम छह भाग प्रमाण स्पर्श है। तैजस तथा आहारक समुद्घात में संख्यात घनांगुलप्रमाण स्पर्श है ॥549॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका