
उवजोगो वण्णचऊ, लक्खणमिह जीवपोग्गलाणं तु।
गदिठाणोग्गहवत्तणकिरियुवयारो दु धम्मचऊ॥565॥
अन्वयार्थ : ज्ञान-दर्शनरूप उपयोग जीवद्रव्य का लक्षण है। वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श यह पुद्गल द्रव्य का लक्षण है। जो गमन करते हुए जीव और पुद्गलद्रव्य को गमन करने में सहकारी हो उसको धर्मद्रव्य कहते हैं। जो ठहरे हुए जीव तथा पुद्गलद्रव्य को ठहरने में सहकारी हो उसको अधर्मद्रव्य कहते हैं। जो संपूर्ण द्रव्यों को स्थान देने में सहायक हो उसको आकाश कहते हैं। जो समस्त द्रव्यों के अपने-अपने स्वभाव में वर्तने का सहकारी है उसको कालद्रव्य कहते हैं ॥565॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका