गदिठाणोग्गहकिरिया जीवाणं पुग्गलाणमेव हवे।
धम्मतिये ण हि किरिया, मुक्खा पुण पुण साधका होंति॥566॥
अन्वयार्थ : गमन करने की या ठहरने की तथा रहने की क्रिया जीवद्रव्य तथा पुद्‍गलद्रव्य की ही होती है। धर्म, अधर्म, आकाश में ये क्रिया नहीं होती, क्योंकि न तो ये एक स्थान से चलायमान होते हैं, और न इनके प्रदेश ही चलायमान होते हैं। किन्तु ये तीनों ही द्रव्य जीव और पुद्‍गल की उक्त तीनों क्रियाओं के मुख्य साधक हैं ॥566॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका