जत्तस्स पहं ठत्तस्स आसणं णिवसगस्स वसदी वा।
गदिठाणोग्गहकरणे धम्मतियं साधगं होदि॥567॥
अन्वयार्थ : गमन करने वाले को मार्ग की तरह धर्म द्रव्य जीव पुद्‍गल की गति में सहकारी होता है। ठहरनेवाले को आसन की तरह अधर्म द्रव्य जीव पुद्‍गल की स्थिति में सहकारी होता है। निवास करनेवाले को मकान की तरह आकाश द्रव्य जीव पुद्‍गल आदि को अवगाह देने में सहकारी होता है ॥567॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका