
ववहारो पुण कालो, माणुसखेत्तम्हि जाणिदव्वो दु।
जोइसियाणं चारे, ववहारो खलु समाणो त्ति॥577॥
अन्वयार्थ : व्यवहारकाल मनुष्यलोक में ही जाना जाता है क्योंकि ज्योतिषी देवों के चलने से ही व्यवहारकाल निष्पन्न होता है। अत: ज्योतिषी देवों के चलने का काल और व्यवहार काल दोनों समान हैं ॥577॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका