कालो वि य ववएसो, सब्भावपरूवओ हवदि णिच्चो।
उप्पण्णप्पद्धंसी, अवरो दीहंतरट्ठाई॥580॥
अन्वयार्थ : काल यह व्यपदेश (संज्ञा) मुख्यकाल का बोधक है, निश्चयकाल द्रव्य के अस्तित्व को सूचित करता है क्योंकि बिना मुख्य के गौण अथवा व्यवहार की प्रवृत्ति नहीं हो सकती। यह मुख्य काल द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा नित्य है तथा पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है तथा व्यवहारकाल वर्तमान की अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है और भूत-भविष्यत् की अपेक्षा दीर्घान्तरस्थायी है ॥580॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका