जीवतत्त्वप्रदीपिका
एयदवियम्मि जे, अत्थपज्जया वियणपज्जया चावि।
तीदाणागदभूदा, तावदियं तं हवदि दव्वं॥582॥
अन्वयार्थ :
एक द्रव्य में जितनी त्रिकालसंबंधी अर्थपर्याय और व्यंजनपर्याय हैं उतना ही द्रव्य है ॥582॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका