आगासं वज्जित्ता, सव्वे लोगम्मि चेव णत्थि वहिं।
वावी धम्माधम्मा अवट्ठिदा अचलिदा णिच्चा॥583॥
अन्वयार्थ : आकाश को छोड़कर शेष समस्त द्रव्य लोक में ही हैं - बाहर नहीं हैं। तथा धर्म और अधर्मद्रव्य व्यापक हैं, अवस्थित हैं, अचलित हैं और नित्य हैं ॥583॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका