लोगस्स असंखेज्‍जदिभागप्पहुदिं तु सव्‍वलोगो त्ति।
अप्पपदेसविसप्पणसंहारे वावडो जीवो॥584॥
अन्वयार्थ : एक जीव अपने प्रदेशों के संकोच-विस्तार की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग से लेकर संपूर्ण लोक तक में व्याप्‍त होकर रहता है ॥584॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका