पोग्गलदव्वाणं पुण, एयपदेसादि होंति भजणिज्जा।
एक्केक्को दु पदेसो, कालाणूणं धुवो होदि॥585॥
अन्वयार्थ : पुद्‍गल द्रव्यों का क्षेत्र एक प्रदेश से लेकर यथायोग्य भजनीय होता है। यथा - द्वयणुक एक प्रदेश अथवा दो प्रदेश में रहता है। त्र्यणुक एक प्रदेश, दो प्रदेश अथवा तीन प्रदेश में रहता है। और कालाणु लोकाकाश के एक-एक प्रदेश में एक-एक करके ध्रुवरूप से रहते हैं ॥585॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका