जीवतत्त्वप्रदीपिका
लोगागासपदेसा, छद्दव्वेहिं फुडा सदा होंति।
सव्वमलोगागासं, अण्णेहिं विवज्जियं होदि॥587॥
अन्वयार्थ :
लोकाकाश के समस्त प्रदेशों में छहों द्रव्य व्याप्त हैं और अलोकाकाश आकाश को छोड़कर शेष द्रव्यों से सर्वथा रहित हैं ॥587॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका