
सव्वमरूवी दव्वं, अवट्ठिदं अचलिआ पदेसा वि।
रूवी जीवा चलिया, तिवियप्पा होंति हु पदेसा॥592॥
अन्वयार्थ : सर्व अरूपी द्रव्य अर्थात् मुक्त जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल अवस्थित हैं, अपने स्थान से चलते नहीं हैं। पुनश्च इनके प्रदेश भी अचलित ही हैं, एक स्थान में भी चलित नहीं हैं। पुनश्च रूपी जीव अर्थात् संसारी जीव चलित हैं, स्थान से स्थानांतर में गमनादि करते हैं। पुनश्च संसारी जीवों के प्रदेश तीन प्रकार के हैं - विग्रहगति में सर्व चलित ही हैं, अयोगकेवली गुणस्थान में अचलित ही हैं, अवशेष जीव रहे उनके आठ मध्यप्रदेश तो अचलित हैं और शेष प्रदेश चलित हैं। योगरूप परिणमन से इस आत्मा के अन्य प्रदेश तो चलित होते हैं और आठ प्रदेश तो अकंप ही रहते हैं ॥592॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका