
पोग्गलदव्वम्हि अणू, संखेज्जादी हवंति चलिदा हु।
चरिममहक्खंधम्मि य, चलाचला होंति हु पदेसा॥593॥
अन्वयार्थ : पुद्गल द्रव्य में परमाणु और द्वयणुक आदि संख्यात, असंख्यात, अनंत परमाणुओं के स्कंध चलित हैं। अंतिम महास्कंध के कितने ही परमाणु अचलित हैं, अपने स्थान से त्रिकाल में स्थानांतर को प्राप्त नहीं होते। तथा कितने ही परमाणु चलित हैं, वे यथायोग्य चंचल होते हैं ॥593॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका