
जीवदुगं उत्तट्ठं, जीवा पुण्णा हु सम्मगुणसहिदा।
वदसहिदा वि य पावा, तव्विवरीया हवंति त्ति॥622॥
अन्वयार्थ : जीवपदार्थ और अजीवपदार्थ तो पहले जीवसमास अधिकार में और यहाँ षट्द्रव्य अधिकार में कहे हैं। जो सम्यक्त्व गुणयुक्त हो और व्रतयुक्त हो, वे पुण्य जीव है तथा इनसे विपरीत सम्यक्त्व, व्रत रहित जो जीव, वे पाप जीव है ॥622॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका