
मिच्छाइट्ठी पावा, णंताणंता य सासणगुणा वि।
पल्लासंखेज्जदिमा, अणअण्णदरुदयमिच्छगुणा॥623॥
अन्वयार्थ : मिथ्यादृष्टि पाप जीव हैं। वे अनंतानंत हैं, क्योंकि द्वितीयादि तेरह गुणस्थानवाले जीवों का प्रमाण घटाने से अवशिष्ट समस्त संसारी जीवराशि मिथ्यादृष्टि ही है। तथा सासादन गुणस्थानवाले जीव पल्य के असंख्यातवें भाग हैं और ये भी पाप जीव ही हैं, क्योंकि अनंतानुबंधी चौकड़ी में से किसी एक प्रकृति के उदय से मिथ्यात्व सदृश गुण को प्राप्त होते हैं ॥623॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका