खीणे दंसणमोहे, जं सद्दहणं सुणिम्मलं होई।
तं खाइयसम्मत्तं, णिच्चं कम्मक्खवणहेदू॥646॥
अन्वयार्थ : दर्शनमोहनीय कर्म के क्षीण हो जाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है उसको क्षायिक सम्यक्‍त्व कहते हैं। यह सम्यक्‍त्व नित्य है और कर्मों के क्षय होने का कारण है ॥646॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका