
वयणेहिं वि हेदूहिं वि, इंदियभयआणएहिं रूवेहिं।
वीभच्छजुगुच्छाहिं य, तेलोक्केण वि ण चालेज्जो॥647॥
अन्वयार्थ : कुत्सित वचनों से, मिथ्याहेतु और दृष्टांतों से, इन्द्रियों को भय उत्पन्न करने वाले भयंकर रूपों से, घिनावनी वस्तुओं से उत्पन्न हुई ग्लानि से, बहुत कहने से क्या, तीनों लोकों के द्वारा भी क्षायिक सम्यक्त्व को चलायमान नहीं किया जा सकता॥647॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका