
दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजादो हु।
मणुसो केवलिमूले णिट्ठवगो होदि सव्वत्थ॥648॥
अन्वयार्थ : दर्शनमोह की क्षपणा का प्रारंभ कर्मभूमि में उत्पन्न हुआ मनुष्य ही केवली के पादमूल में ही करता है। किन्तु निष्ठापक चारों गतियों में होता है ॥648॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका