
संखावलिहिदपल्ला, खइया तत्तो य वेदमुवसमगा।
आवलिअसंखगुणिदा, असंखगुणहीणया कमसो॥658॥
अन्वयार्थ : संख्यात आवली से भक्त पल्यप्रमाण क्षायिकसम्यग्दृष्टि हैं। क्षायिक सम्यग्दृष्टि के प्रमाण का आवली के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतना ही वेदक सम्यग्दृष्टि जीवों का प्रमाण है। तथा क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवों के प्रमाण से असंख्यातगुणा हीन उपशम सम्यग्दृष्टि जीवों का प्रमाण है ॥658॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका