
सण्णाणतिगं अविरदसम्मादी छट्ठगादि मणपज्जो।
खीणकसायं जाव दु, केवलणाणं जिणे सिद्धे॥688॥
अन्वयार्थ : आदि के तीन सम्यग्ज्ञान अव्रतसम्यग्दृष्टि से लेकर क्षीणकषायपर्यन्त होते हैं। मन:पर्ययज्ञान छट्ठे गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक होता है और केवलज्ञान तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान में तथा सिद्धों के होता है ॥688॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका