
णवरि य सुक्का लेस्सा, सजोगिचरिमो त्ति होदि णियमेण।
गयजोगिम्मि वि सिद्धे, लेस्सा णत्थि त्ति णिद्दिट्ठं॥693॥
अन्वयार्थ : शुक्ललेश्या में यह विशेषता है कि वह संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली गुणस्थानपर्यन्त होती है और इसमें जीवसमास दो ही होते हैं। इसके ऊपर अयोगकेवली गुणस्थानवर्ती जीवों के तथा सिद्धों के कोई भी लेश्या नहीं होती, यह परमागम में कहा है ॥693॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका