थावरकायप्पहुदी, अजोगिचरिमो त्ति होंति भवसिद्धा।
मिच्छाइट्ठिट्ठाणे, अभव्‍वसिद्धा हवंति त्ति॥694॥
अन्वयार्थ : भव्यसिद्ध स्थावरकाय मिथ्यादृष्टि से लेकर अयोगी पर्यन्त होते हैं और अभव्यसिद्ध मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही रहते हैं ॥694॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका