मिच्छो सासणमिस्सो, सगसगठाणम्मि होदि अयदादो।
पढमुवसमवेदगसम्मत्तदुगं अप्पमत्तो ति॥695॥
अन्वयार्थ : सम्यक्‍त्वमार्गणा में मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र तो अपने-अपने गुणस्थान में ही होते हैं और प्रथमोपशम तथा वेदक ये दो सम्यक्‍त्व चतुर्थ गुणस्थान से लेकर सातवें गुणस्थान तक होते हैं ॥695॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका