
विदियुवसमसम्मत्तं अविरदसम्मादि संतमोहो त्ति।
खइगं सम्मं च तहा, सिद्धो त्ति जिणेहि णिद्दिट्ठं॥696॥
अन्वयार्थ : द्वितीयोपशम सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थान से लेकर उपशांतमोहपर्यन्त होता है। क्षायिक सम्यक्त्व चतुर्थगुणस्थान से लेकर अयोगकेवलीगुणस्थान पर्यन्त एवं सिद्धों के भी होता है ॥696॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका