सण्णी सण्णिप्पहुदी, खीणकसाओत्ति होदि णियमेण।
थावरकायप्पहुदी, असण्णित्ति हवे असण्णी हु॥697॥
अन्वयार्थ : संज्ञी जीव संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषायपर्यन्त होते हैं। असंज्ञी जीव स्थावरकाय से लेकर असंज्ञीपंचेन्द्रिय पर्यन्त होते हैं। इनमें गुणस्थान एक मिथ्यात्व ही होता हैं ॥697॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका