
थावर कायप्पहुदी, सजोगिचरिमोत्ति होदि आहारी।
कम्मइय अणाहारी, अजोगिसिद्धे वि णायव्वो॥698॥
अन्वयार्थ : स्थावरकाय मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली पर्यन्त आहारी होते हैं और कार्मणकाय योगवाले तथा अयोगकेवली और सिद्ध अनाहारक समझने चाहिये ॥698॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका