
गोयमथेरं पणमिय, ओघादेसेसु वीसभेदाणं।
जोजणिकाणालावं, वोच्छामि जहाकमं सुणह॥706॥
अन्वयार्थ : सिद्धों को वा वर्धमान तीर्थंकर को वा गौतमगणधर स्वामी को अथवा साधुसमूह को नमस्कार करके गुणस्थान और मार्गणाओं के जोड़नेरूप बीस भेदों के आलाप को क्रम से कहता हूँ, सो सुनो ॥706॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका