ओघे मिच्छदुगेवि य, अयदपमत्ते सजोगिठाणम्मि।
तिण्णेव य आलावा, सेसेसिक्को हवे णियमा॥708॥
अन्वयार्थ : गुणस्थानों में मिथ्यात्वद्विक अर्थात् मिथ्यात्व और सासादन तथा असंयत, प्रमत्त और सयोगकेवली इन गुणस्थानों में तीनों आलाप होते हैं। शेष गुणस्थानों में एक पर्याप्‍त ही आलाप होता है ॥708॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका