
दुविहं पि अपज्जत्तं, ओघे मिच्छेव होदि णियमेण।
सासणअयदपमत्ते, णिव्वत्तिअपुण्णगो होदि॥710॥
अन्वयार्थ : दोनों प्रकार के अपर्याप्त आलाप समस्त गुणस्थानों में से मिथ्यात्व गुणस्थान में ही होते हैं। सासादन, असंयत, प्रमत्त इनमें निर्वृत्त्यपर्याप्त आलाप होता है ॥710॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका