जोगं पडि जोगिजिणे, होदि हु णियमा अपुण्णगत्तं तु।
अवसेसणवट्ठाणे, पज्‍जत्तालावगो एक्को॥711॥
अन्वयार्थ : सयोगकेवलियों में योग की (समुद्घात की) अपेक्षा से नियम से अपर्याप्‍तकता होती है, इसलिये उक्त पाँच गुणस्थानों में तीन तीन आलाप और शेष नव गुणस्थानों में एक पर्याप्‍त ही आलाप होता हैं ॥711॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका