
तिरियचउक्काणोघे, मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णे व।
णवरि य जोणिणि अयदे, पुण्णो सेसेवि पुण्णो दु॥713॥
अन्वयार्थ : तिर्यंच पाँच प्रकार के होते हैं - सामान्य, पंचेन्द्रिय, पर्याप्त, योनिमती, अपर्याप्त। इनमें से अंत के अपर्याप्त को छोड़कर शेष चार प्रकार के तिर्यंचों के आदि के पाँच गुणस्थान होते हैं। जिनमें से मिथ्यात्व, सासादन, असंयत इन गुणस्थानों में तीन-तीन आलाप होते हैं। इसमें भीइतनी विशेषता और है कि योनिमती तिर्यंच के असंयत गुणस्थान में एक पर्याप्त आलाप ही होता है क्योंकि बद्धायुष्क भी सम्यग्दृष्टि स्त्रीवेद के साथ तथा प्रथम नरक के सिवाय अन्यत्र नपुंसक वेद के साथ भी जन्म ग्रहण नहीं करता, शेष मिश्र और देशसंयत में पर्याप्त आलाप ही होता है ॥713॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका