
तेरिच्छियलद्धियपज्जत्ते एक्को अपुण्ण आलावो।
मूलोघं मणुसतिये, मणुसिणिअयदम्हि पज्जत्तो॥714॥
अन्वयार्थ : लब्ध्यपर्याप्त तिर्यंचों के एक अपर्याप्त ही आलाप होता है। मनुष्य के चार भेद हैं - सामान्य, पर्याप्त, मनुष्यनी, अपर्याप्त। इनमें से आदि के तीन मनुष्यों के चौदह गुणस्थान होते हैं। उनमें गुणस्थान सामान्य के समान ही आलाप होते हैं। विशेषता इतनी है कि असंयत गुणस्थानवर्ती मानुषी के एक पर्याप्त आलाप ही होता है॥714॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका