मणुसिणि पमत्तविरदे, आहारदुगं तु णत्थि णियमेण।
अवगदवेदे मणुसिणि, सण्णा भूदगदिमासेज्‍ज॥715॥
अन्वयार्थ : जो द्रव्य से पुरुष है, किन्तु भाव की अपेक्षा स्त्री है ऐसे प्रमत्तविरत जीव के आहारक शरीर और आहारक आंगोपांग नामकर्म का उदय नियम से नहीं होता। भाव मनुष्यनी में चौदह गुणस्थान है, द्रव्य मनुष्यनी में पाँच ही गुणस्थान हैं। वेदरहित अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाले मनुष्यनी के जो मैथुनसंज्ञा कही है वह भूतगतिन्याय की अपेक्षा से कही है ॥715॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका