
सव्वसुराणं ओघे, मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णेव।
णवरि य भवणतिकप्पित्थीणं च य अविरदे पुण्णो॥717॥
अन्वयार्थ : समस्त देवों के चार गुणस्थान सम्भव हैं। उनमें से मिथ्यात्व, सासादन, अविरत गुणस्थान में तीन तीन आलाप होेते हैं। किन्तु इतनी विशेषता है कि सभी भवनत्रिक देव-देवी तथा कल्पवासिनी देवी इनके असंयत गुणस्थान में एक पर्याप्त ही आलाप होता है ॥717॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका